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Monday, 5 December 2016

some passing thoughts put on paper -----hindi





 अपने चेहरे से जो ज़ाहिर है छुपायें कैसे ?
 तेरे दिए हुए जख्मो  पे मरहम  लगायें कैसे ?
दर्द जब हद से गुज़र रहा है तो ,
छलकती आँखों से अश्क़ न बहाएँ कैसे ?


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 खुली किताब के सफ़्हे उलटते रहते हैं
 जैसे ज़िन्दगी के वाकिये बदलते  रहते है
किताबो को तो बंद कर दे हम 
पर जिंदगी को तो खुदा के मिजाज़ छलते हैं 

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हर्ष और उल्लास , आमोद और प्रमोद
है साथ साथ चलते , डाले हाथो में हाथ
लेकिन सुख के साथ क्यों चलता है दुःख
क्या सुख का कोई हमजोली नहीं ?
शायद सुख दुःख हमजोली नहीं भाई भाई है 
शायद दोनों एक ही माँ के जाये है
शायद दोनों ने मिलकर विश्व के नियम बनाये है

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